Wednesday, 31 August 2011

नर्क बीज जम्बूदीपे भरत खण्डे

नर्क बीज जम्बूदीपे भरत खण्डे
ब्लॉ.आगत शुक्ल,31 अगस्त, 2011 

भारत का मन सत्य को कथाओं की ध्वनियों संप्रेषण करता है और ध्वनि व्यक्ति के ग्राहय गुण और उसके अपने तल के गुण रूपों में वर्तती है। कथाओं के स्वर, शब्द ध्वनि के बीजों को हर व्यक्ति के हृदय की उर्वरा और उसके परिवेश से अपने-अपने अर्थ संम्पे्रषित करते अपने अर्थ गढ़ते है, पुरातन परिवेश अपने समय के नर्क को कथाओं में और वर्तमान समय अपने-अपने नर्क को हमारे आसपास के परिवेश में दिखाता चलता है। जिसमें हमने  अपने-अपने तरह के दुख-सुख तय किये हैं और जाने-अंजाने अपने नर्क और स्वर्ग भी तय कर लिये...हमने अपने सारे संसाधनों के आयोजन और प्रयोजन पर सुख की तख्तियां लगा ली हैं, किसी वि़द्धान का कथन है कि जब हम किसी व्यवस्था को चलाने के लिए जो आयोजन प्रयोजन करते हैं। एक दिन वे आयोजन-प्रयोजन खुद व्यवस्थागत बोझ बन जाते हैं। हमने इस सदी में अपने हाथों से बनाये नर्क ईजाद कर लिए है। हमने अपनी तरह की सार्थकतायें गढ़ ली है।

कहते हैं कि मृत्यू के बाद पहिले पुण्य का फल मिलता है और फिर पापों का हिसाब-किताब होने के बाद ही इस संसार में आने की बारी लगती है l आवागमन चाहे शरीर का हो या रेल का, दृश्य अपने बदले स्वरूप में होता है लेकिन उसकी मूल वेदना एक सी है। मूत्र उत्सर्जन का मार्ग और हमारे जन्म का द्वार भी... यदि नर्क के पहले-पहल की तत्क्षण स्थिति में नर्क हमारा पहला क्षण होता है  फिर अनंत से आने वाले मानस में फिर-फिर संसार जकड़ लेता है।

अष्टावक्र जन्म के पहिले ही पिता के उपनिषद प्रवचन को असत्य कह देते हैं बदले में पिता के श्राप से आठ जगह से टेढे हो जाते हैं, cq) जन्मते ही आठ कदम चलते हैं और चार आर्य सत्य कहते हैं जिसमें पहला है ‘ संसार दुख है ’

रेल जब भी शहर में प्रवेश करती है नर्क के समतुल्य दोनों किनारों का परिवेश अपने गन्ध, दृश्य, ध्वनि और पहियों के घिसटने से उठती लोहे की जली गन्ध स्टेशन के समीप्य का अहसास कराती है। स्टेशन... संसार.... आने वाला है। अब बुद्ध का मज्जिम मार्ग ओझल होने लगता...स्टेशन एक संसार  की तरह हो जाता है। पद की उंचाई प्रथम श्रेणी के आराम कक्ष में, पद की लम्बाई दृतीय श्रेणी कक्ष में और पद का शून्यत्व  फुटपाथ को तय करती है। जेब में रखा धन पुण्यरूप, गर्म काफी की चुस्की में, दृतीय क्षेणी पेट की भूख मिटाने की गठजो़ड़ और तृतीय श्रेणी भूख और भीख पर अपना समय काटती...

उतरना जरूरी हो तो यह स्टेशन है.. उतरते ही भीख मांगते बच्चे बूढ़े जवान, औरतें, लगडे़-लूले, सड़ते, घिसटते अपना नर्क में अपने-अपने रोल करते दीखते, इस परिवेश को नजरअंदाज करते यात्री वैराग्य प्रदष्रित करते इन शरीरों को ईश्वर के भरोसे छोड़ पूरे विश्वास से अपने उन घरों की चल देते जो उनके अपने-अपने संसार है। स्टेशन के बाहर अधूरी टूटी-फूटी सड़क, कामेच्छा और उदरेच्छा की पूर्ति करने की इच्छा से घूमते छोटे-बड़े कुत्तों का समूह, एक दुबली-पतली कुतिया जो स्टेशन के कोनों में पड़ी अधखायी चीजों, बच्चों की दूधभरी उल्टी, या अपने ही मरे बच्चे के अधखाये शरीर को अपने जन्मने वाले बच्चे की दूध की चिन्ता में दौड़ती भागती दीखती है। मुझे बरबस अपने देश की हीरोईनें याद आने लगती जिनके लिए अधिक कपडे पहनना नर्क में जाने के बराबर है। इसलिए वे कम कपड़े पहनकर अपने को स्वर्ग में होने का अहसास कराती सी लगती हैं। जिस्म परोसती सी...जलेबीबाई....


यहां से देखें तो शहर विज्ञापनों का शहर लगता है। कुछ बोर्ड केवल अपने ही नम्बर दिखाते नजर आते हैं तो कुछ बोर्ड शlसकीय शराब बेचने का अधिकार रखते हुए गांधी को अपने विज्ञापन में प्रमुख जगह दिखाते नजर आते हैं। चैlराहों पर जहां लाल हरी पीली बत्तियों के सहारे जहां शहर रेंगता रहता है उन्ही चैlराहों पर किन्ही बोर्ड में वर्णसंकर लड़की कुछ ऐसे बैठै दिखती है कि मानो अप्सरा हो, उसकी खुली मांसल जांघों के बीच का काला अंधेरा आंखों को बरबस उसी जगह पर बारंबार ले जाता है जो हमारे आने का द्वार है। इस द्धार का पुरानापन अब भी इतना तरंगित करता है कि उसकी अपनी आर्कषकत्ता बरबस खींचती है कि लाल-हरी बत्ती का ध्यान तो बस छूट ही जाता है और चैlराहे पर वर्दी पहिने संविधान अपने कर्तव्य बोध से आपको झिझोड़ डालता है।

नकली कोलतार से बनी नयी सड़क एक ही बरसात में जंगल के रास्ते में बदली दीखने लगी है जैसे ढली उमर की लड़की ब्यूटी पार्लर से आते होली के हुड़दंगों के बीच जा फसी है। सड़क के दोनों तरफ लगे नेताओं के चेहरे पता नहीं क्यों मुस्कुराते दीखते हैं। जिनकी सत्ता है वे मुस्कुराते हैं ? जिनकी सत्ता पहिले थी और अब नहीं है और न ही आयेगी वे भी मुस्कुराते हैं ? आम आदमी अपने घर की आमदनी का हिसाब लगाते अपनी मुस्कुराहटों की याद करने लगता है।


आगे गर्मी से कोलतार की पिघलती हुई काली सड़क पर नंगे पैर, हाथों में जूते उठाये. देश की सांस्कृतिक विरासत के अंतिम पहनावे को पहने किसान कचहरियों को ओर काले कोट पहिने आदमी के पीछे-पीछे दुम सी दबाये चलते दीखते..., हाथों में हथकड़ी को कलफ किये कुरते के जेब में डाले दूसरे हाथ में मोबाईल से बात करता आदमी सड़क पार करता, बीचों-बीच खड़ा हो जाता है। गांडियां एक दूसरे को देख खुद-ब खुद खड़ी हो जाती। लोग काना-फूसी करते भई कौन है ? गब्बर सिंह, मलखान सिंह, पूजा बब्बा, हरीसिंह, हैं क्या, डाईवर बताने लगता है अरे नहीं..अपने भैया जी हैं...सबके अन्न दाता है...आजकल शनि की दशा के कारण अंदर हैं, ज्यादा दिन नहीं रहेंगे...बस छूट जायेंगे... अब कचहरी तो जाना ही पड़ता है न साहब... देखो...देखो...कार्यकर्ता भैया के पांव छू रहे हैं...

आगे जाम लगा है। नई सड़कों पर गढ़ढे खोद बल्लियां गाड़ दी गयी हैं। लोग आज अपना नाम भूल गये है, काम भूल गये हैं बस वे पार्टी के हो गये हैं जो कल तक जिस पार्टी का झन्डा अपनी गाड़ी पर सजाये घूम रहे थे दूसरी पार्टी के जीते ही उसके अपने हो गये, बाजार से झन्डा ले आये खरीद कर और चैlराहे पर लहरा-लहरा कर... फहरा रहे हैं। अंदर बहुत दूर के मैदान के स्पीकर की आवाज आ रही हैं मैं....शपथ लेता हूं कि जो प्रकरण मेरे..............................उसे मैं पूरी ईमानदारी और निष्ठा से पूरा करूंगा।

साथ में मिले-जुले गानों दबी आवाज भी सुनाई पढ़ती है
लाये हैं तूफान से कश्ती निकाल के भारत की लाज रखना मेरे बच्चो सम्हाल के...
ऐ मेरे वतन के लोगो जरा हाथ में भर लो पानी जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी...

आगे चैlराहे पर किसी महापुरूष की मूर्ति लगाई जा रही है ताबूतनुमा बक्सा गाड़ी से बाहर निकाला जा रहा है। बक्से की पैकिंग किये हुए अखबार के टुकड़े हवा में उड़कर मेरे पैरों तक आकर फंस जाते हैं। वी. आई. पी. आने वाले हैं...रास्ता बन्द हो गया है... पैर में लिपटे पुराने अखबार की कतरने समय बिताने पढ़ने लगता हूं।

खबरें हैं बहुत सारी...रेल, बसस्टेंड, कचहरी, थाना, अस्पताल, कमजोर पुल, खर्चीले कारखाने, डिजिटल बूचड़खाने, नये शराबखाने, विदेशी होटल, गन्दी मण्डी, लोहा और केमीकल कारखाने, प्रदूषित नदियां, छोटा नागपुर में आग पर गांव, बस्तर, सोनामी, बिहार में बाढ़, मुम्बई में आतंकवादी, बादल का फटना, कारगिल के यु़द्धवीर, ताबूतों का व्यापार, सेवा-व्यापार, मिलावट, मंदिर में लोभ, लालच, भ्रष्टाचार, बेईमान नेता, अफसर, सरकार,... जनता मुफतखोर या लाचार....
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मूर्ति  कपड़े से ढकी पढ़ी है....सुना है...नेता जी का हिस्सा-बिस्सा और आफिस का खर्चा शिल्पकार पर इतना भारी पड़ा है कि महापुरूष का सिर अभी तक नहीं बना है...

हम होंगे कामयाब ...गाते हुए स्कूली बच्चे जुलूस निकालकर कतार में आ रहे हैं....

5 comments:

  1. शायद आदत हो जाती है आंखों को यह सब देखने की.

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  2. इतनी बार देखा पर इस तरह नही

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  3. भरतखण्ड का यह अन्दाज पहली बार देख रहा हूँ। आदत बनाई जाती है या कहिए कि बनती है। किसी दिन चमचमाती सड़कों वाले देश में भी भी ऐसे ही था, जिनकी संख्या पचास के करीब है। बस, वहाँ के किसी आदमी को आदत नहीं हुई और वह आज दिखता है।

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  4. आपकी आंखों से आज बहुत कुछ देखा ...

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